शनिवार, 12 जून 2010

ऐ साकी 21-25





(21)
कहने को दिल मेरा अलमस्त है साकी
मगर, जहाँ का दर्द समेटे है साकी,
कहीं भी इक कतराये-अश्क गिरा
मेरे दिल में उठी इक हूक है साकी
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(22)
देखो, चाँद चलते-चलते रूक गया है साकी
आधी रात का समां भी महक गया है साकी,
तारों ने यकायक टिमटिमाना छोड़ दिया है
वो नीन्द से उठके छत पे टहल रहे हैं साकी
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(23)
चेहरा तुम्हारा उदास क्यों है ऐ साकी
मय खत्म हुआ तो क्या बात है साकी,
जब रिन्दों की महफिल जम ही गयी है
हम पानी पी के भी झूम लेंगे ऐ साकी
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(24)
उस रोज हमने “ना” समझा था साकी
कल हमने “हाँ” समझ लिया था साकी
अफसोस, कि उनके इशारों के -
दोनों ही मतलब गलत निकले ऐ साकी
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(25)
उनकी शर्मो-हया का क्या जिक्र करें साकी
अपनी शराफत का भी क्या जिक्र करें साकी,
मौका था, हसरतें थीं, और तनहाई भी-
इक-दूजे को हम, फिर भी छू न सकें ऐ साकी
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गुरुवार, 10 जून 2010

ऐ साकी 16-20


(16)
हम बे-मौसम तो नहीं आये हैं साकी
घटा छाने के बाद ही आये हैं साकी,
क्या, यह सावन का महीना ही नहीं है?
ओह, आज उनकी जुल्फें खुली थीं साकी!
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(17)
हमें बदनामी से डर नहीं लगता साकी
हम कुछ भी खुले-आम करते हैं साकी,
वो तो शराफत बरतते हैं जन्नत में जाके-
हूर औमय पाने की उम्मीद में साकी
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(18)
वे कभी मय पी के धुन पे नाचते नहीं हैं साकी
हसीं चेहरों को नजर उठा के तकते नहीं हैं साकी,
लगता है खुदा के ये नेक औशरीफ बन्दे
जन्नत जाके मक्खियाँ मारा करेंगे साकी
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(19)
क्या हुआ जो हम मँझधार में छूट गये साकी
क्या हुआ जो माँझी ने साथ छोड़ दिया साकी,
हमें फिर भी उनसे कोई शिकायत नहीं है
किनारे पड़े रहने से तो बेहतर हैं साकी
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(20)
मदहोश करके सवाल करते हो साकी
मय पिला के उनका हाल पूछते हो साकी,
नहीं जानते कि हम पी के होश में आते हैं
तजुर्बेदार हो के भी कमाल करते हो साकी
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सोमवार, 7 जून 2010

ऐ साकी / 11-15




(11)
देर से आने का सबब पूछते हो साकी
आज उनसे मिलने का वादा था साकी,
वो आ न सकें, मगर पैगाम भेजवाया
उनके पैरों की मेहन्दी अभी गीली थी साकी।
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(12)
जहाँ में इतना दर्द औगम क्यों है साकी?
हमदर्दों की हैसियत कम क्यों है साकी?
खुदा की खुदाई से यकीं हटायें तो कैसे?
ला पिला दे, और एक जाम पिला दे साकी।
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(13)
न पूछ कि रातें कैसे कटती हैं साकी
न पूछ कि दिन कैसे गुजरते हैं साकी,
पूछना ही है, तो यह पूछ कि हम
हर शाम कैसे तड़पते हैं साकी।
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(14)
हमारी हर हँसी के पीछे खुशी नहीं है साकी
हमारे हर अश्कों के पीछे गम नहीं है साकी
कभी दिल लगाओ, तो जान जाओगे कि-
हमऔर वोमें से हमनहीं हैं साकी।
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(15)
दर्द बाँटने की चीज न रही साकी
जख्म दिखाने की चीज न रही साकी,
हम हैं कि दिल के जख्म दिखा रहें-
वे वाह-वाहकिये जा रहे हैं साकी।
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