सोमवार, 14 अगस्त 2017

कारवाँ: eBook

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शनिवार, 12 जून 2010

ऐ साकी 21-25

(21)

कहने को दिल मेरा अलमस्त है साकी

मगर, जहाँ का दर्द समेटे है साकी,

कहीं भी इक कतराये-अश्क गिरा

मेरे दिल में उठी इक हूक है साकी.

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(22)

देखो, चाँद चलते-चलते रूक गया है साकी

आधी रात का समां भी महक गया है साकी,

तारों ने यकायक टिमटिमाना छोड़ दिया है

वो नीन्द से उठके छत पे टहल रहे हैं साकी.

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(23)

चेहरा तुम्हारा उदास क्यों है ऐ साकी

मय खत्म हुआ तो क्या बात है साकी,

जब रिन्दों की महफिल जम ही गयी है

हम पानी पी के भी झूम लेंगे ऐ साकी.

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(24)

उस रोज हमने ना समझा था साकी

कल हमने हाँ समझ लिया था साकी

अफसोस, कि उनके इशारों के -

दोनों ही मतलब गलत निकले ऐ साकी.

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(25)

उनकी शर्मो-हया का क्या जिक्र करें साकी

अपनी शराफत का भी क्या जिक्र करें साकी,

मौका था, हसरतें थीं, और तनहाई भी-

इक-दूजे को हम, फिर भी छू न सकें ऐ साकी.

गुरुवार, 10 जून 2010

ऐ साकी 16-20



(16)
हम बे-मौसम तो नहीं आये हैं साकी
घटा छाने के बाद ही आये हैं साकी,
क्या, यह सावन का महीना ही नहीं है?
ओह, आज उनकी जुल्फें खुली थीं साकी!
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(17)
हमें बदनामी से डर नहीं लगता साकी
हम कुछ भी खुले-आम करते हैं साकी,
वो तो शराफत बरतते हैं जन्नत में जाके-
हूर औ’ मय पाने की उम्मीद में साकी.
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(18)
वे कभी मय पी के धुन पे नाचते नहीं हैं साकी
हसीं चेहरों को नजर उठा के तकते नहीं हैं साकी,
लगता है खुदा के ये नेक औ’ शरीफ बन्दे
जन्नत जाके मक्खियाँ मारा करेंगे साकी.
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(19)
क्या हुआ जो हम मँझधार में छूट गये साकी
क्या हुआ जो माँझी ने साथ छोड़ दिया साकी,
हमें फिर भी उनसे कोई शिकायत नहीं है
किनारे पड़े रहने से तो बेहतर हैं साकी.
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(20)
मदहोश करके सवाल करते हो साकी
मय पिला के उनका हाल पूछते हो साकी,
नहीं जानते कि हम पी के होश में आते हैं
तजुर्बेदार हो के भी कमाल करते हो साकी.

सोमवार, 7 जून 2010

ऐ साकी / 11-15


(11)
देर से आने का सबब पूछते हो साकी
आज उनसे मिलने का वादा था साकी,
वो आ न सकें, मगर पैगाम भेजवाया
उनके पैरों की मेहन्दी अभी गीली थी साकी.
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(12)
जहाँ में इतना दर्द औगम क्यों है साकी?
हमदर्दों की हैसियत कम क्यों है साकी?
खुदा की खुदाई से यकीं हटायें तो कैसे?
ला पिला दे, और एक जाम पिला दे साकी.
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(13)
न पूछ कि रातें कैसे कटती हैं साकी
न पूछ कि दिन कैसे गुजरते हैं साकी,
पूछना ही है, तो यह पूछ कि हम
हर शाम कैसे तड़पते हैं साकी.
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(14)
हमारी हर हँसी के पीछे खुशी नहीं है साकी
हमारे हर अश्कों के पीछे गम नहीं है साकी
कभी दिल लगाओ, तो जान जाओगे कि-
हमऔर वोमें से हमनहीं हैं साकी.
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(15)
दर्द बाँटने की चीज न रही साकी
जख्म दिखाने की चीज न रही साकी,
हम हैं कि दिल के जख्म दिखा रहें-
वे वाह-वाहकिये जा रहे हैं साकी.
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शनिवार, 5 जून 2010

ऐ साकी / 6-10

(6)
वे हमसे मयकशीं छोड़ने को कहते हैं साकी
खुदा की बन्दगी करने को कहते हैं साकी,
जबकि खुदा के दर पे डर लगता है हमें-
उसकी खौफ नहीं, बन्दूकों के साये से साकी.
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(7)
अपनी मय पे इतना गरूर न कर साकी
तुझे इक बात का तजुर्बा ही नहीं है साकी,
कि इश्क में मय से कहीं ज्यादा नशा है
तेरे दर पे हम तो आदतन आते हैं साकी.
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(8)
हर सुबह इक ख्याल आता है साकी
सारा दिन उसे दुहराते रहते हैं साकी,
ख्याल यह है कि मयकशीं छोड़ दें, मगर
हर शाम तेरे दर पे चले आते हैं साकी.
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(9)
तुम भी क्या मजाक करते हो साकी
गुलाब की कलियों की बात करते हो साकी,
लगता है जमाने से पीछे रह गये हो, आज
वो ‘बैंक बैलेन्स’ पे सवाल करते हैं साकी.
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(10)
उन शेख की खबर सुनी तुमने ऐ साकी
जवानी जिसने किताबों में गुजार दी थी साकी
दीवाना बना वह सड़कों पे घूम रहा है
किताबों के बदले जवानी माँग रहा है साकी.
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बुधवार, 2 जून 2010

ऐ साकी


(1)
उस रोज जितना पिलाया था साकी
आज उससे कहीं ज्यादा पिला दे साकी,
उस रोज वादा किया था मिलने का उन्होंने
आज वो वादा तोड़ दिया है साकी.
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(2)
सुना है पुराना मयकदा है यह साकी
अफसाने तुमने बहुत सुने हैं साकी,
हमें भी बताना, वो खुदा की अमानत
किसके लिये बचाके रक्खे हैं साकी.
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(3)
शराफत औ’ नजाकत न रही सच है साकी
मुहब्बत औ’ इबादत भी खत्म है साकी,
मगर ऐसा जुल्म न ढाओ हम दिलजलों पर
न कहो, न कहो कि ‘मय खत्म’ ऐ साकी.
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(4)
चाँदी के सिक्कों की बात करते हो साकी
वह हम अलमस्तों के पास कहाँ है साकी,
आगे पिलाओ, न पिलाओ मर्जी तुम्हारी
हमने तो उम्र अपनी तुम्हारे नाम कर दी साकी.

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(5)
आज हमारे अश्कों का सबब न पूछ ऐ साकी
आज अपने हाथों से ही पिला दे साकी,
हमारे हाथ थक गये, दुआ में उठे हुए आज
आज उनकी डोली रूखसत हुई है साकी.

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गुरुवार, 27 मई 2010

मिलन

जब सिन्दुरी शाम ढल चुकी हो
और सूर्य
शान्त झील में अस्त हो चुका हो
पँछी लौट रहे हों बसेरों की तरफ-
कलरव ध्वनी के साथ.
पेड़ और झुरमुट लिपटने लगे हों
कालिमा की चादर में
तब ........
पायल की मद्धम छनक के साथ
तुम चली आना झील के किनारे
आँचल से चेहरे को छुपाते
चूड़ियों की खनक को
यथासम्भव कम रखते हुए
तुम चली आना.

तुम्हारी सलोनी कलाईयों को थामकर
मैं तुम्हें पास बुलाऊँगा
थोड़ा सकुचाकर, सर झुकाकर, धीरे से
तुम मेरे सीने से लग जाओगी.
तुम्हारे तपते कानों की गर्मी को
मैं अपनी गर्म साँसों से महसूस करूँगा
और तुम मेरे अधीर दिल की धड़कन
अपने दिल से महसूस करना.
हम चुप रहेंगे.

झींगुरों की लगातार ध्वनी
आज शहनाई-सी लगेगी,
झुरमुट में जुगनू टिमटिमा रहे होंगे
मानो, उत्सव की तैयारी हो.
गम्भीर झील की जलराशि भी
हमारे मिलन को देख सिहर जायेगी.
शीतल हवा शरारत से
तुम्हारी लटों को बिखरा कर चली जायेगी.
तुम अपना चेहरा उठाओगी
तुम्हारी अधखुली आँखें, काँपते होंठ और
गर्म साँसें
काफी कुछ कह जायेंगी.

ऐ झील, ऐ चाँद, ऐ पेड़ों के साये,
ऐ पँछी, ऐ जुगनुओं,
तुम सब साक्षी हो हमारे मिलन के.
जैसे दिवा-रात्रि का संगम
यह सन्ध्या शाश्वत है,
हम-दोनों का मिलन भी शाश्वत है.
सृष्टि की रचना के समय हम थे
आज हैं, और
सृष्टि की समाप्ति तक हम रहेंगे.

हमारा मिलन शाश्वत है.
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कोहरा

आओ खो जायें
भोर के इस घने कोहरे में
हम-तुम दोनों.
जहाँ न हम दुनिया को देख पायें
और न दुनिया वाले हमें.
एक-दूसरे को बाँहों का सहारा देकर
हम चुपचाप चलते रहेंगे
घने कोहरे के बीच
पतली पगडण्डी पर.
हमारे चारों तरफ
कोहरे की ऊँची दीवारें होंगी-
आकाश को छूती.
हरी भींगी घास का
एक छोटा मैदान,
कोहरे में लिपटे कुछ पौधे,
कुछ झाड़ियाँ और
चिड़ियों की चहचहाहट
यही हमारी
छोटी-सी दुनिया होगी
कुछ देर के लिये.

हम एक-दूसरे की
साँसों की गर्मी को महसूस करते
चुपचाप चलते रहेंगे
घने कोहरे के बीच.
कोहरा हमारे लिये रास्ता बनायेगा
जैसे वासुदेव को कभी
यमुना ने रास्ता दिया था.
हम कुछ देर के लिये
भींगी घास पर भी चलेंगे
नँगे पाँव.
हम कोहरे में डूबे एक
छोटे तालाब के पास से गुजरेंगे,
जहाँ पानी की सतह से
भाप की हल्की लकीरें उठ रही होंगी.
फिर हम कोहरे में लिपटे
एक छोटे जंगल से गुजरेंगे,
जहाँ पेड़ बस साये की तरह
नजर आयेंगे-
मानो स्वप्नलोक हो.
पत्तियों पर जमी ओस
बूँद बनकर
रह-रह कर टपक रही होगी.
एक बूँद शायद
तुम्हारे गाल पर गिरे
और तुम मुझे देखकर
मुस्कुरा दो.

फिर कोहरे का आँचल
सिमटने लगेगा.
सूरज भी कोहरे की आड़ में
चढ़ आया होगा.
हम हाथघड़ी को देखेंगे
और कोहरे के जंगल से
कंक्रीट के जंगल की ओर लौट पड़ेंगे;
जहाँ अब मोटरों की शोरगुल
और लोगों की भागदौड़
शुरु हो चुकी होगी.
इस दौड़ में हिस्सा लेने के लिये
हम जल्दी-जल्दी कदम बढ़ायेंगे;
पर मन-ही-मन
अगले कोहरे के बारे में सोचेंगे
कि वह कब आयेगा.
तुम फिर मेरे साथ चलोगे न-
भोर के घने कोहरे में
खो जाने के लिये?

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