गुरुवार, 6 मई 2010

तुम्हारी याद


किसी खिलती हुई कली को देखकर
तुम्हारे चेहरे को याद कर लेता हूँ,
चेहरा खिला रहे तुम्हारा-
खुदा से यही फरियाद कर लेता हूँ।

गहराती हर शाम की ठण्डी हवा
तुम्हारे साथ होने का अहसास दे जाती है,
दिन-रात निहारने पर भी नहीं मिटती
तुम्हारी तस्वीर यह कैसी प्यास दे जाती है।

तुम्हारी उँगलियों के सुन्दर अक्षरों कि लिये
मैं चातक-सा आस लगाया करता हूँ,
तुम्हारी बाँहों में शाम गुजार देने का
हर रात मैं सपने सजाया करता हूँ।

कुदरत की हर खूबसूरती में दोस्त
तुम्हारी ही सूरत नजर आती है,
जिन्दा हूँ तुम्हारी याद के बल पर
तुम्हारी याद ही मुझे तड़पाती है।

जाने तुमसे मुलाकात होगी या नहीं
होगी भी तो किस मौसम में,
तुम्हारे बिना जी रहा हूँ- जी लूँगा
याद आ जाना हर खुशी औगम में।

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