शनिवार, 8 मई 2010

चाहकर भी


यह कैसी चाहत है कि
चाहकर भी
तुम्हारी गलियों में
कदम बढ़ा नहीं पाते हैं।

यह कैसी चाहत है कि
चाहकर भी
तुम्हारी नजरों से
नजरें मिला नहीं पाते हैं।

बहुत हमने चाहा कि
बता दें तुम्हें
अपनी चाहत के बारे में,
पर जब भी सामने आते हो-

यह कैसी चाहत है कि
चाहकर भी
अपने दिल की बात
तुम्हें बता नहीं पाते हैं।
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1 टिप्पणी:

  1. जय श्री कृष्ण...आपके ब्लॉग पर आ कर बहुत अच्छा लगा...बहुत अच्छा लिखा हैं आपने.....भावपूर्ण...सार्थक

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