गुरुवार, 27 मई 2010

मिलन

Art- Gourang Beshai

जब सिन्दुरी शाम ढल चुकी हो
और सूर्य
शान्त झील में अस्त हो चुका हो
पँछी लौट रहे हों बसेरों की तरफ-
कलरव ध्वनी के साथ
पेड़ और झुरमुट लिपटने लगे हों
कालिमा की चादर में
तब ........

पायल की मद्धम छनक के साथ
तुम चली आना झील के किनारे,
आँचल से चेहरे को छुपाते
चूड़ियों की खनक को
यथासम्भव कम रखते हुए
तुम चली आना

तुम्हारी सलोनी कलाईयों को थामकर
मैं तुम्हें पास बुलाऊँगा
थोड़ा सकुचाकर, सर झुकाकर, धीरे से
तुम मेरे सीने से लग जाओगी

तुम्हारे तपते कानों की गर्मी को
मैं अपनी गर्म साँसों से महसूस करूँगा
और तुम मेरे अधीर दिल की धड़कन
अपने दिल से महसूस करना

हम चुप रहेंगे

झींगुरों की लगातार ध्वनी
आज शहनाई-सी लगेगी,
झुरमुट में जुगनू टिमटिमा रहे होंगे
मानो, उत्सव की तैयारी हो
गम्भीर झील की जलराशि भी
हमारे मिलन को देख सिहर जायेगी
शीतल हवा शरारत से
तुम्हारी लटों को बिखरा कर चली जायेगी

तुम अपना चेहरा उठाओगी
तुम्हारी अधखुली आँखें, काँपते होंठ और
गर्म साँसें
काफी कुछ कह जायेंगी

ऐ झील, ऐ चाँद, ऐ पेड़ों के साये,
ऐ पँछी, ऐ जुगनुओं,
तुम सब साक्षी हो हमारे मिलन के
जैसे दिवा-रात्रि का संगम
यह सन्ध्या शाश्वत है,
हम-दोनों का मिलन भी शाश्वत है

सृष्टि की रचना के समय हम थे
आज हैं, और
सृष्टि की समाप्ति तक हम रहेंगे

हमारा मिलन शाश्वत है
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3 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.

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  2. सुन्दर शब्द चयन के साथ अनुभूतियों की आकर्षक अभिव्यक्ति...शुभकामनाएं।

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  3. गजब की रचना..जज्बातों का उफान...काबिल-ए-तारीफ..

    सौरभ

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