शनिवार, 22 मई 2010

गीत

चित्रकार: अनूप श्रीधरन

सावन आकर बीत गया
हाय पिया नहीं मेरे आये,
बिन सजना के एक भी पल
हाय जीया नहीं अब जाये

कहके गये थे अबकि बरस
वो सावन में घए आयेंगे,
बरसों की प्यासी धरती पर
वो घनघोर घटा बरसायेंगे
पापी पपीहा की बोली अब तो
हाय दिल में तीर चलाये.
सावन आकर....

दिन तो कट जाता पनघट में
पीपल तले मैं साँझ बिताऊँ,
रोज-रोज इन सखियों को
क्या कहकर मैं समझाऊँ
बैरन बनकर रातें अब तो
हाय तन में अगन लगाये
सावन आकर....

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