गुरुवार, 27 मई 2010

कोहरा


आओ खो जायें
भोर के इस घने कोहरे में
हम-तुम दोनों
जहाँ न हम दुनिया को देख पायें
और न दुनिया वाले हमें
एक-दूसरे को बाँहों का सहारा देकर
हम चुपचाप चलते रहेंगे
घने कोहरे के बीच
पतली पगडण्डी पर
हमारे चारों तरफ
कोहरे की ऊँची दीवारें होंगी-
आकाश को छूती
हरी भींगी घास का
एक छोटा मैदान,
कोहरे में लिपटे कुछ पौधे,
कुछ झाड़ियाँ और
चिड़ियों की चहचहाहट
यही हमारी
छोटी-सी दुनिया होगी
कुछ देर के लिये

हम एक-दूसरे की
साँसों की गर्मी को महसूस करते
चुपचाप चलते रहेंगे
घने कोहरे के बीच
कोहरा हमारे लिये रास्ता बनायेगा
जैसे वासुदेव को कभी
यमुना ने रास्ता दिया था
हम कुछ देर के लिये
भींगी घास पर भी चलेंगे
नँगे पाँव

हम कोहरे में डूबे एक
छोटे तालाब के पास से गुजरेंगे,
जहाँ पानी की सतह से
भाप की हल्की लकीरें उठ रही होंगी
फिर हम कोहरे में लिपटे
एक छोटे जंगल से गुजरेंगे
जहाँ पेड़ बस साये की तरह
नजर आयेंगे-
मानो स्वप्नलोक हो
पत्तियों पर जमी ओस
बूँद बनकर
रह-रह कर टपक रही होगी
एक बूँद शायद
तुम्हारे गाल पर गिरे
और तुम मुझे देखकर
मुस्कुरा दो

फिर कोहरे का आँचल
सिमटने लगेगा
सूरज भी कोहरे की आड़ में
चढ़ आया होगा
हम हाथघड़ी को देखेंगे
और कोहरे के जंगल से
कंक्रीट के जंगल की ओर लौट पड़ेंगे;
जहाँ अब मोटरों की शोरगुल
और लोगों की भागदौड़
शुरु हो चुकी होगी
इस दौड़ में हिस्सा लेने के लिये
हम जल्दी-जल्दी कदम बढ़ायेंगे;
पर मन-ही-मन
अगले कोहरे के बारे में सोचेंगे
कि वह कब आयेगा

तुम फिर मेरे साथ चलोगे न-
भोर के घने कोहरे में
खो जाने के लिये?

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