बुधवार, 5 मई 2010

टुकड़े


 (1)
जाने कितनी चोटों को सहकर सख्त हुआ है यारों
वर्ना बात-बात पर पिघल जाया करता था यह दिल। 
(2)
हम तो हार गये, अब तुम्हीं बता दो ऐ मेरे मालिक,
कभी मुस्कुराने, कभी आँसू बहाने को जी क्यों चाहता है
(3)
सबसे तेज सवारी चुनकर हम समय से पहले पहुँच गये,
वहाँ देखा- शतरंज की बिसात, अभी बिछी ही न थी।
(4)
कश्ती किससे करे शिकायत कि माँझी ने उसे डुबोया,
इसी माँझी के इन्तजार में तो उसने दिन गुजारे थे।
(5)
बहुत कम खुशनसीब होते हैं जिन्हें
हमारी तरह यूँ जाम पे जाम मिले हैं;
दुआ कबूल करना ऐ साकी, हर जाम
लबों तक आकर छूट गया तो क्या।
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