गुरुवार, 10 जून 2010

ऐ साकी 16-20


(16)
हम बे-मौसम तो नहीं आये हैं साकी
घटा छाने के बाद ही आये हैं साकी,
क्या, यह सावन का महीना ही नहीं है?
ओह, आज उनकी जुल्फें खुली थीं साकी!
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(17)
हमें बदनामी से डर नहीं लगता साकी
हम कुछ भी खुले-आम करते हैं साकी,
वो तो शराफत बरतते हैं जन्नत में जाके-
हूर औमय पाने की उम्मीद में साकी
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(18)
वे कभी मय पी के धुन पे नाचते नहीं हैं साकी
हसीं चेहरों को नजर उठा के तकते नहीं हैं साकी,
लगता है खुदा के ये नेक औशरीफ बन्दे
जन्नत जाके मक्खियाँ मारा करेंगे साकी
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(19)
क्या हुआ जो हम मँझधार में छूट गये साकी
क्या हुआ जो माँझी ने साथ छोड़ दिया साकी,
हमें फिर भी उनसे कोई शिकायत नहीं है
किनारे पड़े रहने से तो बेहतर हैं साकी
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(20)
मदहोश करके सवाल करते हो साकी
मय पिला के उनका हाल पूछते हो साकी,
नहीं जानते कि हम पी के होश में आते हैं
तजुर्बेदार हो के भी कमाल करते हो साकी
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