शनिवार, 5 जून 2010

ऐ साकी / 6-10


(6)
वे हमसे मयकशीं छोड़ने को कहते हैं साकी
खुदा की बन्दगी करने को कहते हैं साकी,
जबकि खुदा के दर पे डर लगता है हमें-
उसकी खौफ नहीं, बन्दूकों के साये से साकी
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(7)
अपनी मय पे इतना गरूर न कर साकी
तुझे इक बात का तजुर्बा ही नहीं है साकी,
कि इश्क में मय से कहीं ज्यादा नशा है
तेरे दर पे हम तो आदतन आते हैं साकी
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(8)
हर सुबह इक ख्याल आता है साकी
सारा दिन उसे दुहराते रहते हैं साकी,
ख्याल यह है कि मयकशीं छोड़ दें, मगर
हर शाम तेरे दर पे चले आते हैं साकी
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(9)
तुम भी क्या मजाक करते हो साकी
गुलाब की कलियों की बात करते हो साकी,
लगता है जमाने से पीछे रह गये हो, आज
वो बैंक बैलेन्सपे सवाल करते हैं साकी
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(10)
उन शेख की खबर सुनी तुमने ऐ साकी
जवानी जिसने किताबों में गुजार दी थी साकी
दीवाना बना वह सड़कों पे घूम रहा है
किताबों के बदले जवानी माँग रहा है साकी
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